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लोककलाओं  में  झलका उत्तराखंड  का जीवन

लोक कला का रहा है जीवन से सरोकार

  उत्तराखंड  का जीवन कठिन परिस्थितियों का रहा है। इस हिमालयी क्षेत्र को प्रकृति का अनमोल वरदान है। प्रकृति यहां सुंदर भी है गूढ भी है, वह मौन भी है और उसमें एक संवाद भी है। प्रकृति का निश्चल भाव है तो कभी कभी उफनता हुआ रूप भी। भारतीय सभ्यता में एक पूरे क्षेत्र का अपना एक इतिहास है, अपना एक संघर्ष है। इसे देवभूमि कहने का अभिप्राय यहां कदम कदम पर मंदिर,  मठ  तमाम तीर्थ स्थलों को होना भर नहीं  बल्कि आदि काल में ऋषियों की वाणी और उनकी गूंज का अलौकिक भाव है। यहां के जीवन में प्रकृति का सौंदर्य है। लेकिन जीने की कठिन परिस्थितियां भी हैं। सदियों की गूढता रहस्य भी झलकता है और जीवन का नाद भी है। प्रकृति नैसर्गिक सौंदर्य भी और वनस्पति जडी बूटी जल जंगल का अपार स्रोत्र अपने में समाए हैं। न जाने इन प्राकृतिक वैभव में कितनी अनसुलझी  अनजानी चीजें होंगी। हम बहुत छोटा हिस्सा जान पाए। न जाने सदियों से कितनी प्रार्थना तपस्या ध्यान में लीन गूंजों को असर होगा कि यहां के जीवन का भाव अभी भी अलौकिक सा लगता है। जीवन के ऐश्वर्य को तलाशते हुए और प्रकृति से मनमानी छेडछाड के बावजूद अभी भी सृष्टि अपने शुभ रूप को बहुत कुछ बचाए हुए हैं।

उत्तराखंड हिमालय की गंगा जमुना संस्कृति का उद्गम स्थल भी है। यहां के जीवन में जो संघर्ष है उससे जूझने का कौशल भी। इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत में धर्म संस्कृति  साहित्य कला संगीत दर्शन सब कुछ समाहित है। यहां के जीवन में शिव पार्वती का जो स्वरूप पूजनीय माना गया है वह नृत्य प्रधान है। यहां के लोकजीवन के कला में लोकनृत्य की अनूठी भावभंगिमा है। गीत कला  मूर्तिशिल्प यहा के जीवन को अभिव्यक्त करते हैं।  उत्तराखंड की लोकगाथांओ में यहां का अतीत बताता है। उत्तराखंड का सांस्कृतिक छटाएं बहुरंगी हैं।  प्राचीन समय से ही यहां आर्यस किरात कौल आदि जातियों का आगमन होता रहा। हमारे जीवन में इसके कई प्रतीक दिखते हैं।  हमारी लोक संस्कृति कई विविधताओं को साथ लिए हुए हैं। कला संगीत साहित्य मूर्तिशिल्प पेंटिग लोकगायन  लोकनृत्य जिस भी विधा में देखें उसके सुंदर चिन्ह बल्कि आत्मा झलकती है। यहां जीवन में जो कुछ समाहित होता चला गया वह कला के रूप में सामने आता रहा। बहरंगी संस्कृति  लोकजीवन  को  महसूस कराता रहा।  पहाडों में मानवीय जीवन का शायद ही कोई कोना बचा हो जो यहा कला और साहित्य से अछूता रहा हो। समय के साथ जीवन में कुछ बदलाव आते गए संस्कृति कला अपनी पंरपराओं को साथ रख कुछ नया स्वरूप भी पाती रही।  इस भूमि का नैसर्गिक सौंदर्य तो लोगों को पास बुलाता रहा साथ ही परिस्थितियों के चलते भी हिमालय का यह क्षेत्र  जातियों और उनके समूहों का वास बना।

 उत्तराखंड के विस्तार को धर्म के स्वरूप में देखे या गूढ दर्शन  अध्यात्म के रूप में , उसके अपने वृतांत हैं। यहां का जीवन जिस रूप में मुखरित हुआ है उसके प्रतीक चिन्ह हमें मिलते हैं।  पुराणों में उत्तराखंड क गढवाल को केदारखंड  कहा गया और कुमाऊं क्षेत्र को कूर्मांचल। आज की भौगोलिक और राजनीतिक व्यवस्था में हम जिस उत्तराखंड को पाते हैं उसमें मैदान तराई के इलाके भी हैं। वहां का भी अपना रचा बसा संसार है। अपनी संभ्यता है।  धार्मिक अध्यात्मिक कारण और प्रकृति के अनूठे वरदान केकारण यह क्षत्र सदियों से लोगों को प्रभावित करता रहा। पवित्र गंगा यमुना का उद्गम,  चार धाम, नैनी देवी का मंदिर,  पिंडारी ग्लेशियर,  दूधातोली पर्वत   बिनसर के जंगल आदि इस क्षेत्र को एक परिचय देते हैं। महाभारत के प्रसंगों में इस क्षेत्र का वर्णन हैं। उस महा कथा में इस पांडवो के अज्ञातवास से लेकर उनके स्वर्गारोहण की कथाएं इस क्षेत्र से जुडी हैं। देखा जाए तो यह भूमि है जहां ऋषि मुनि तप किया करते थे। ये ऋषि मुनि कौन थे । ये उस समय के वैज्ञानिक   कित्साशास्त्री,  इंजीनियर , नक्षत्रवेता ,ज्योतिषी, योगशास्त्री  भू विज्ञानी,  वनस्पति जडी बूटी के जानकार थे।  अपने क्षेत्र में शोध मनन करना ही उनका तप था। उनका जीवन संयमित था वे नियम से बंधे थे  साथ में पूजा अर्चना करते थे। वे समाज से दूर रहकर भी समाज के लिए लीन थे। इसलिए यह तप भूमि भी बनी। इस क्षेत्र ने कई परंपरा  सभ्याता को बनते बिगडते देखा है। जो भी सभ्यता यहां आई अपने प्रतीक चिन्ह छोडती गई। नई सभ्यता अपने संस्कार परंपरा लाई और कुछ पुरानी चीजों को  आत्मसात किया।  समूचा उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र अपनी पवर्त चोटियों, नदियों झरने तालाब  ऊंचे बुग्याल देवदार बांझ खरसू मोरु  के वृक्ष, बर्फीले शिखरों को लिए अपनी छटा बिखेरते है। बुरांश फ्यूंली के फूल यहांकी शोभा बढाते हैं ऋतुराज वंसत यहां इतने सुंदर रूप में आते है कि प्रकृति का कोना कोना सौंदर्य से खिल उठता है। कोयल की कूक  भली लगती है।  उत्तराखंड के एक हिस्से को पंद्रहवी  शताब्दी के आसपास गढवाल कहा गया। गढ यानी किले। गढवाल क्षेत्र का अपना इतिहास है।  मनोहारी नंदा देवी चोटी, चौखंबादून गिरी नीलकंठ जैसी उच्च श्रेणियो वाले गढवाल में नयाभिराम करने जैसी कई पर्वतमालाएं हैं। किरात और उससे पहले कौल  पुलिंद खस जातियां यहां आई और यही की होकर रह गई। प्राचीन जाति  किरात जाति का फैलाव पूर्व के असम से होते हुए हिमालये के इस क्षेत्र और आगे कश्मीर तक होता चला गया। हमारे आदि ग्रंथो वैदिक साहित्य में किरातों का विवरण मिलता है। 

 इसी तरह पौराणिक ग्रंथो में कुमाऊ को मानसखंड कहा गया। पौराणिक मान्यता है कि कानदेव पर्वत पर  विष्णु भगवान का कूर्मा रूप अवतार हुआ था। बाद में इसी पर्वत के नाम पर उत्तराखंड के इस क्षेत्र को कूर्मांचल कहा गया जो आगे कुमाऊ कहलाया। वैसे कुमाऊं क्षेत्र का सबसे ज्यादा उल्लेख स्कंदपुराण में मिलता है। गढवाल की तरह ही इस क्षेत्र में भी किरात किन्नर गंधर्व नाग जातियों के होने का उल्लेख आता है। कुमाऊं क्षेत्र भी समय के साथ अपना विस्तार पाता रहा। महाभारत समय के भी यहां कई प्रसंग हैं। जगह जगह पर नाग देवों का मंदिर होना बताता है कि नाग जातियां कभी यहां रहा करती थी।  बाद में कुंमाऊं और गढवाल दोनो जगह प्रभावी खस जातियों के होने का प्रमाण मिलता है। जिन बावन गढो का उल्लेख मिलता है वो भी लगभग इन जातियों के प्रभाव में थी। इस पर्वतीय क्षेत्र में बौद्ध धर्म भी अपने विस्तार के साथ रहा। अशोक के स्तंभ देहरादून के पास कालसी में है । बौद्ध धर्म का प्रचार कनिष्क के समय से और प्रभावी ढंग से फैला। और लगभग अगले छह सात दशक तक बौद्ध धर्म अपनी जडे फैलाता गया।  लेकिन समय के साथ बौद्ध धर्म यहां अपने स्वरूप को खोने लगा। आदि गुरु शंकराचार्य ने चार धामों की स्थापना करके फिर से हिंदू  सनातन धर्म को पुर्नप्रतिष्ठा दिलाई। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में  कत्यूरी शासन के समय को समझना महत्वपूर्ण है। कत्यूरी शासन का समय लगभग दो शताब्दी का माना जाता है। इनकी राजधानी कार्तिकेयपुर को वर्तमान में जोशीमठ के रूप में जाना जाता है। इस शासन के समय मूर्तिकला और  किलों  प्राचीन किलों के अवशेष कहीं कहीं नजर आते हैं। यही दौर था जब देश के विभिन्न भागो से कई राजपूत ब्राहमण इन क्षेत्रों में आने लगे और यही की परंपरा में समाहित हो गए। बाद में बाहरी आक्रमणों की वजह से  लोग इन क्षेत्रों को सुरक्षित मान कर आते रहे।  उत्तराखड के स्वरूप और लोकसंस्कृति को समझने के लिए नागपंथ के अस्तित्व और समाज में उसकी अपनी भूमिका को समझना जरूरी है। 84 सिद्धों से निकले नागपंथ पर बौद्ध और शैव दर्शन का प्रभाव दिखता है। कहते हैं कि पंद्रहवीं सदी में  सत्यनाथ और उनके शिष्य नागनाथ  उत्तराखंड के इस क्षेत्र में आए थे। श्रीनगर और चंपावत के इलाकों में उनके डेरे पडे। नाथ परंपरा के तंत्र मत्र  साधना,  उनके श्रुति गीत और कहावतें आदि की यहां विशिष्ट छाप है। खासकर गढवाल में नागपंथ छाया रहा। आज भी गढवाल कुमाऊं में कुछ गुफाएं इनके सिद्ध योगियों की तप साधना का प्रतीक बनकर उस दौर को अभिव्यक्ति के रूप में है। उत्तराखंड के पहाडों में नरसिंह पूजा में इनकी नृत्य भंगिमा का महत्व आज भी बना हुआ है। योग और तंत्र से नागपंथ की उपासना समाज में अपने अस्तित्व को बनाए रखी। और कहना होगा कि समाज इससे अछूता नहीं रह सका।  राजा कनकपाल को पंवार वंश को स्थापित करने का श्रेय जाता है। वह गुजरात के धारा नगरी से आए थे। राजा भानुप्रताप ने अपनी लडकी का विवाह उनसे रचाया। पंवार वंश के साठ शासक हुए और देश की आजादी के बाद राजवंश खत्म हुए तो पंवार वंश भी इतिहास बना। बीच का एक छोटा सा दौर गोरखाली शासन का भी है। कुमाऊ और गढवाल में भूकंप आने से भारी क्षति होने पर नेपाल से गोऱखों को आक्रमण का अवसर मिला। यहां अस्थिर हालातोंमें उन्होंने पहले कुमाऊ और फिर गढवाल को जीत लिया। 1803 से 1815 के बीच गोऱखो का शासन क्रूर अत्याचार के लिए जाना जाता है। इस दौर में संस्कृति कला विज्ञान हर चीज का हास हुआ।

इस पर्वतीय क्षत्र में कला का जीवन से सीधा सरोकार देखना हो तो विभिन्न स्थलों से प्राप्त गुफाओं में उकेरी आकृतियों को देखना चाहिए। गुफा शैल चित्र सदियों पुराने जीवन की मानवीय संभ्यता का संकेत करते हैं। इतिहास का वर्णन अलग अलग कालों में निरूपित है। लेकिन मानवीय संभ्यता के ये वो चरण हैं जिससे पूर्व का इतिहास प्राप्त नहीं होता। अल्मोडा के पास लाखू उडयार ऐसी ही एक स्थल है जहां मानवीय सभ्यता गुफाओं में रहकर चित्रों को भी उकेरा करती थी। यहां मानव आकृति अकेले या नृत्य की भंगिमाओं के साथ है। इसी तरह ग्वारख्या गुफा में बारहसिंगा भेड  चित्र उकेरे गए हैं । यान कला समाजिक जीवन का प्रतिबिंब बनी रही। चमोली में मलारी गांव में शोध कर्ताओं को हजारों बर्ष पुराने मिट्टी के बर्तन मिले। इनका शिल्प पाकिस्तान के स्वात घाटी में मिले बर्तन के अऩुरूप है।फलसीमा में तो  योग और नृत्य मुद्रा में मानव आकृतियां मिली हैं। अल्मोडा के पास कसार देवी के शैल चित्र में करीब बारह नर्तकों का नयनाभिराम चित्रण है।  राज्य का आद्य इतिहास हमें अपने प्राचीन ग्रंथ और पुराणों से पता चलता है। ऋगवेद में इस भूमि को देवभूमि कहा गया है। वेदों के अलावा उपनिषद ब्राहम्ण ग्रंथ आदि में इस क्षेत्र का अलग अलग संदर्भों में जिक्र हुआ है। खासकर कुमाऊं का सार्वधिक उल्लेख स्कंद पुराण के मानसखंड में हुआ है। साथ ही यह भी माना जाता है कि सप्तसिंधु देश के रूप में जानी गई गढ भूमि के बद्रीनाथ क्षेत्र के गणेश नारद, व्यास आदि गुफाओं में वैदिक ग्रंथों की रचना हुई है। पुराने समय की धरोहर को हम लेखो  भी पाते हैं। शिलालेख  मंदिर लेख ताम्रपत्रलेख जैसे प्रतीकों में ऐतिहासिक लेख सुरक्षित हैं। कालसी में अशोक का अभिलेख मिला है। जिसमें  पाली भाषा में अशोक की अंहिसा का प्रचार है।

आगे भी जारी...http://lekhanadda.com/716/uttarakhand_beautiful_tradition_folk_litrature_and_folk_singing

 

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