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बुद्धिजीवी की कलम से
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कोरोना: चाहो तो जिता दो, चाहो तो हरा दो...

अनुशासन यानि खुद पर खुद का शासन। हम अगर अपने शासन के तहत रहेंगे तो इस विश्वव्यापी महामारी से बच जाएंगे। अपने परिवारजनों और मित्रों को भी कहिये कि खुद पर खुद का शासन चलाएं। हम अपनी पूरी जिंदगी में अनुशासन में रहने की बात करते हैं, इसकी सलाह देते हैं। मैं कह रहा हूं कि हम 15 दिन इसका पालन कर लें तो खुद और अपनों, अपने जान ने वालों सबको बचा लेंगे। कोरोना नाम की ये महामारी विश्वयुद्ध से कहीं खतरनाक है। ये सब हम-आप देख-पढ़ रहे हैं। इस युद्ध को हथियार से नहीं, अनुशासन से जीता जाना है। तो फिर क्या घबराना और डरना। हमको-आपको अनुशासन में रहना तो आता है ना? अपनी, अपनों की और पूरे देश की जीत के लिए बस अनुशासन में ही तो रहना है.

अगर हमारे राष्ट्राध्यक्ष या और कोई हमको-आपको या पूरे राष्ट्रवासियों को जनता कर्फ्यू का नाम देकर अनुशासन में रहने की सलाह देता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। हम पर अब तक तो ये चीज़ थोपी नहीं जा रही है ना? जो भी कहा जा रहा है उसमें आपके-हमारे बचाव की ही बात की जा रही है, वो भी वैज्ञानिक तर्कों के साथ। तो इसमें किसका अहित है? इन तमाम बातों में न राजनीति खोजिये और न राजनीति के चश्मे से इनको देखिए। सवाल राष्ट्र का और राष्ट्रवासियों का है। घर पर अनुशासन में रहकर ताली और थाली बजाने में भी क्या हर्ज है?

ये ध्यान रखिये कि हम भारतवासी हैं और हमको भारत को बचाना है। जय हो...

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