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बुद्धिजीवी की कलम से
तेरी कलम मेरी कलम

रहे ना रहे हम महका करेंगे...

    बाबरे नैन फिल्म अपने यादगार नग्मों के साथ आई तो रोशन अपने नाम को सार्थक कर गए। गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में रोशन नागराथ का बचपन बीता। बहते चिनाब के पानी में संगीत है। वहां की हवाओं में संगीत है। इसी चिनाब के किनारे पलते बढते रोशन के हाथ में कब दिरूबा और सांरगी जैसा साज आ गया पता न चला।   अपने गुरू मनहर बर्बे के साथ वह लखनऊ आए थे। यहां के मेरिस कालेज आफ म्यूजिक में उन्होंने दाखिला लिया। संगीत की समझ बढी तो वे आकाशवाणी दिल्ली से जुड गए। यहीं उन्होंने रेडियो के कुछ कार्यक्रमों के लिए म्यूजिक दिया था। दिल्ली आए तो मुकेश का साथ मिला। क्लचरर कार्यक्रमों में मुकेश सहगल के गीत सुनाते थे।  यही एक रिश्ता जुडा। मुकेश के गायकी और रोशन की हारमोनियम। हर महफिल में उन्हें पंसद किया जाता। तब कौन जानता था कि आगे मुकेश और रोशन के नाम पर ऐसा गीत संगीत सामने आएगा जो हवा के ताजा झोके की तरह होगा।

  संगीत में कुछ पाने के लिए वह इससे पहले सारंगी सीखने बुंदू खान के के पास गए। लखनऊ में उस्ताद अल्लाउद्दीन     से संगीत सीखना चाहाउस्ताद ने सितार पर हाथ रखवाया तो कहा कि तुम्हें सितार नहीं आएगा। फिर कहा गाना ढोलक   भी   नहीं । इसके बाद कहा कहा मैं सरोद बजाउगा तुम सुना करो, रोशन रोज उनके पास आते और बडी तन्मयता से   उन्हें   सुनते। दो महीने के बाद अल्लाउद्दीन ने कहा कि तुम्हें जो मिलना था वह मिल गया जाओ, मुबंई में जाओ वहां       फिल्म   संगीत में बहुत काम है।रोशन बेहतर संगीत निर्देशक तो थे ही, उस म्यूजिक अरेंजर के तौर पर जिन दो लोगों     को खासकर याद किया जाता है। उनमें सी राचंद्रन और रोशन ने अपने साजों के साथ भारतीय फिल्म संगीत को      बेहद  सुरीला बनाया। आखिर ताजमहल जैसी ऐतिहासिक फिल्म का संगीत उन्हें ही सौंपा गया। जो वादा किया वो निभाना   पडेगा जैसे गीत से पहले रोशन की बरसात की रात की कव्वाली ये इश्क है इश्क, ना तो   कारवा की तलाश  है, सुनकर   लोग झम गए थे। इसके बाद दिल ही तो है में एक और कव्वाली निगाहें मिलाने को दिल   चाहता है रोशन    लेकर आए तो   सबने मान लिया कि कव्वाली की म्यूजिक में रोशन का कोई जवाब नहीं। उनके संगीत से   जहां ने सुने    कई तराने - बडे अरमान से रखा है,

 ओह रे ताल मिले नदी के जल में, सारी - सारी रात तेरी   याद सताए, मन   रे तू काहे न धीर धरे, तेरी दुनिया में   दिल लगता नहीं, आया है, मुझे फिर याद वो जालिम,   बहारों में मेरा चमन लूटकर,   सखी री मेरा मन उलझें   तन डोले, दुनिया करे सवाल तो, रहते थे कभी। रोशन   का संगीत की महफिल तो सजी पर जरा   देर से। फिल्मों में संगीत पाने के लिए रोशन ने हर चौखट को सजदा किया। बहुत तलाश हुई तो निराशा ही मिली । एक   बार अनिल दा विश्वास को संगीत तैयार करते देख रोशन कहने लगे इतना अच्छा म्यूजिक तो मैं नहीं बना सकता। ये   रोशन की निराशा के दिन थे। उन्हें मुंबई आए कुछ समय हो गया था और काम नहीं मिला रहा था। अनिल दा को उनकी   प्रतिभा पर भरोसा था। भरोसा दिलाया और कहा कि एक दिन तुम मुझसे भी आगे जाओगे।

      केदार शर्मा के गीतों को रोशन ने बाबरे नैन के लिए इस तरह सजाया कि फिर हर तरफ रन गीतों की फरमाइष थी। वैसे बाबरे नैन और मल्हार से रोशन को लोकप्रियता मिल गई थी। पर तब के फिल्म निर्माता उनके करीब नहीं आ पा रहें थे। रोशन को बडी सफलता की तलाश थी । उन्हें कुछ शुभचिंतकों ने सलाह भी दे डाली कि संगीत में कुछ बदलाव करो। रोशन से कहा गया कि यह संगीत कर्णप्रिय है । लेकिन फिल्में कुछ और चाहती है। रोशन उधेडबुन में थे कि एक दिन पान चबाते हुए एसडी बर्मन उनके घर पहुंच गए। उस समय मजरूह सुल्तानपुरी भी वहीं पर थी। एसडी बर्मन कहने लगे ये रोशन तुम अपना स्टाइल मत बदलना। काम नहीं मिल रहा है कोई बात नहीं । आगे जरूर मिलेगा। तुम्हारा संगीत जमाना याद करेगा। रोशन के लिए इतने शब्द काफी थे। फिर उनके साजों से जो संगीत निकला वह रोशन करने वाला ही था। वह रोशन ही थे जिन्होंने इंदीवर और आनंद बख्शी जैसे गीतकारों को फिल्म जगत में बे्रक दिया था। मल्हार में इंदीवार के गीत सुने गए वही वल्लाह क्या बत है में रोशन ने आनंद बख्शी को मौका दिया था।

रोशन के साजों में पहले गीत भी मुकेश के लिए ही थे। तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं, सच सच बताओं कब दिल में समाए थे, ख्यालों में इस तरह किसी के आया नहीं करते, जैसे गीतों के लिए मुकेश की आवाज थी। इसके आगे मुकेश के लिए कई यादगार धुनें दी। बहुत डूब कर संगीत दिया। मुकेष के गाए ओह रे ताल मिले नदी के जल में गीत की धुन तैयार करने के लिए तो वह मुबंई  से करीब चालीस किमी दूर एक तालाब में हारमोनियम लेकर गए थे। मुकेश भी साथ थे। इस गीत के लिए उन्होंने कई धुनें तैयार की लेकिन इनमें कोई उनके मन न भाई। आखिर एक दिन उन्होंने मुकेश से साथ चलने को कहा और दोनों पनवेन से आगे की झील के किनारे बैठ गए । पैर पानी में डाले और हारमोनियम बजाने लगे। देखते ही देखते एक अच्छी धुन सामने थी। यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ।

          (रोशन)

 रोशन ने अपने संगीत में बांसुरी और सारंगी का इस्तेमाल खुबसूरती के साथ किया। रोशन कहा करते थे कि लिबास कोई भी हो आत्मा भारतीय होनी   चाहिए, संगीत बदलता है पैर मूल्य नहीं बदलते चाहिए। उन्होंने संगीत की इस परंपरा का निर्वाह अंत तक किया। जब भी किसी नग्में के लिए साज   उठाया  तो उसे इतना सुंदर सजाया कि वह सबको मंत्रमुग्ध कर गया। उनका संगीत एक तरह से शास्त्रीयता और लोकसंगीत का मिश्रण था । और यह   आजकल के फ्यूजन से नहीं समझा जा सकता रोशन के संगीत में हरियाणवी टच लिए गीत सच बोल बलम इव क्या होगा भी सुना गया वहीं सवाल जबाव    लिए सच सच बताओं कब दिल में समाए थे एक नई शुरूआत के साथ तो।उस शुरूआती दौर को याद कर राजकुमारी बताया करती थीं, कि किस तरह   जब वह गाने लगी सच बोल बलम अब क्यो होगा, तो रोशन टोकते अब क्या होगा नहीं इब क्या होगा। वह समझ नहीं पाती थी कि इस क्यों कहा जा रहा   है। कई बार इस शब्द के लिए दोबारा गवाया गया। आखिर गीत इब क्या होगा ही बना ।कविता शायरी, पर रोशन ने अपने साजों के साथ बेहतर काम   किया । कव्वाली ऐसी बनाई कि स्कूल कालेजों के कार्यक्रम या पिकनिक हर जगह वही कव्वाली गूंजी। नीरज के लिखे गीत कारवा गुजर गया को भी   रोशन ने ही संगीत में ढाला । जब नीरज इस गीत को लेकर रोशन के पास गए थे तो उनसे कहा गया कि इसे कवि सम्मेलन में कैसे पढते हो। नीरज के उन पंक्तियों को सुनाया। फिर एक कालजयी गीत बन गया। नई उमर की नई फसल के लिए नीरज के गीत देखती ही रहों आज दपर्ण न तुम की रोशनने धुन बनाई तो मुकेश ने नीरज से कहा था कि यह फिल्म तो नहीं चलेगी लेकिन इसकी धुन भी इतनी अच्छी बनी है, कि तुम्हारा यह गीत बहुत सुना जाएगा।

    रोशन को फिल्म जगत में बेहतर म्यूजिक अरेजर के तौर पर जाना जाता है।

शास्त्रीय संगीत की समझ थी। मन रे तू काहे, गरजत बरसत, लागा चुनरी में दग, सखी री मेरा मन जैसे कई तराने रोशन की यादों को उन्होंने संवार कर बेहद सुंदर बनाया था। फिल्म अनारकली के लिए रामचंद्रन जैसे संगीतकार की एक धुन के अंतरे को उन्होंने संवार कर बेहद सुंदर बनाया था। फिल्म अनारकली के लिए रामचंद्रन धुन तैयार कर रहे थे गीत था ये जिंदगी उसी की है। जो किसी का हो गया गीत के जो अंतरे तो हो गए थे। वह तीसरे अंतरे में कुछ अलाप देकर नयापन लाना चाहते थे। बात बन नहीं रही थी। तब रोशन पास ही थे। उन्होंने कहा रोशनजी जरा मदद कीजिएगा। तीसरा अंतरा जिसके बोल है, सुनाएगी दास्ता को अलाप के साथ इस तरह सजाया कि रामचंद्रन कहने लगे यही तो मेरे मन में धुमड रहा था। आप उसे बाहर ले आए।

     (राजेश रोशन)

        रोशन जब भी कोई धुन बनाते थे। तो अपने छोटे बेटे राजेश रोशन को बुलाते और फिर कहते यह धुन कैसी लगी। बरसात की रात की कव्वाली ये इश्क    इश्क है, के लिए रोशन ने रात भर बैठकर धुने तैयार की थी। सुधा, मुन्नाडे सभी ने पूरी रात भर इसकी रिहर्सल की थी। कव्वाली लंबी थी। कव्वाली की धुन      तैयार कर रोशन सुबह रिकार्ड लेकर घर पहुंचे और अपनी पत्नी को सुनाने लगे। इस कव्वाली को सुनकर उनकी पत्नी के कहा कि इतनी लंबी कव्वाली को      फिल्म में कौन सुनेगा। लोग थियेटर से बाहर निकल कर आ जाएंगे। तब रोशन ने कहा था कि लोग इस कव्वाली को सुनेंगे तो चिराग लेकर ढूढेंगे कि रोशन    कहा है। सच ही कहा था रोशन न। कव्वाली हर जगह गूंजने लगी। उन्होंने कव्वाली को उसके दरबारी अंदाज से बाहर निकालकर आम बना दिया था।          समय के साथ फिल्म लोग भूल गए लेकिन कव्वाली सबकी जुबान पर रही.रोशन उन संगीतकारों में थे जिन्होंने गायाकों को इस बात की पूरी छूट दी कि वे   कुछ नया कर सकें तो करें। वह धुन सुनाते थे फिर कहते थे कि गाओ अगर कही कुछ तान देनी है या कुछ नया करना हो तो करो। परंपरागत भारतीय धुनों   पर उनकी गहरी पकड थी। बीस बरस तक उन्होंने अपनी हार्ट की बीमारी को झेला। उनके निधन से कुछ समय पहले ममता के गीत रहे न रहे हम महका करेंगे के लिए बजने वाले साज शायद रोशन के संगीत को सलाम कर रहे थे। 16 नवंबर 1967 को रोषन ने मुबंई अस्पताल में आखरी सांस ली थी। उनके गीत आज भी महक रहे है। जिस छोटे बेटे को वह अपनी बनाई धुनें सुनाते थे उसने आगे चलकर राजेश रोशन के नाम से जूली, दो और दो पांच, कहो न प्यार जैसी कई फिल्मों के लिए मषहूर धुन तैयार की। रोशन परिवार का एक चिराग आज युवा पीढी की आंखों का तारा है। लोग उसे ऋतिक रोशन के नाम से जानते हैं।

(ऋतिक रोशन)

(समस्त फोटो साभार GOOGLE)

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