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तेरी कलम मेरी कलम

तुम बह न जाओ कहीं...

तुम आंखो में समायी हो, अश्क बहाऊं भी तो कैसे
तुम्हें जो समेटा है अश्कों में, तुम बह न जाओ कहीं,


इसलिए मैं रोता नहीं हूं गुमसुम रहता हूं
तुम दूर न चले जाओ कहीं।
मेरा कतरा-कतरा जिस्म का, तुम्हारी सांसों से लिपटा है


तु दूर चला गया बिन बताये, फिर भी तुझसे न कोई शिकवा न गिला है
अंजानी राहों में मिला है तू, जानी पहचानी राहों से जुदा हुआ है तू
कभी हुआ नहीं अपना, शायद बिछड़ने के लिए मिला है तू।


तु पास है नहीं, कभी था भी नहीं,
पर अपना लगा है, तो बस लगा है तू,
तुम्हें जो समेटा है अश्कों में, तुम बह न जाओ कहीं,
इसलिए मैं रोता नहीं हूं गुमसुम रहता हूं,
तुम दूर न चले जाओ कहीं।।

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