जय बद्री विशाल
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
मैं महर्षियों में भृगु हूँ, वाणियों में एकाक्षर (ॐकार) हूँ। यज्ञों में जपयज्ञ हूँ और स्थावरों (अचल/अडिग वस्तुओं) में हिमालय हूँ।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि जैसे पर्वतों में हिमालय महान है, वैसे ही स्थावर (अचल, स्थिर वस्तुओं) में वे स्वयं हिमालय हैं।
हिमालय को समझने तथा इसके साथ व्यवहार बदलने के सिवा दोहन का न हो
प्राचीन काल में हिमालयी और चार धाम की यात्रा में रास्तों की पहचान का मुख्य व पुख्ता जानकारी का स्रोत नदियां होती थी
नदियों के किनारे रास्ते और चिट्टियां होती थी इन स्थानों की जानकारी विद्वान साधक प्रभु दत्त ब्रह्मचारी की प्रसिद्ध पुस्तक बद्रीनाथ दर्शन में वर्णित है। इसमें ऋषिकेश से विशेषकर केदारनाथ व बद्रीनाथ तक के चट्टियों का स्पष्ट संकेत और उल्लेख है। जिनमें से अब कुछ का अस्तित्व ही नहीं है ।
और कुछ बड़े बड़े शहर का रुप ले चुके हैं ।
परंतु विडम्बना यह है कि ये सब उस समय अस्थाई हुआ करते थे चतुर्मास में यात्रा का विधान भी नहीं था इसलिए जन हानि नहीं के बराबर होती थी और जो भौगोलिक परिवर्तन होते थे उसके बाद फिर सुविधानुसार चट्टियों के आस पास ही अस्थाई बसावट होती थी ।
वर्तमान में विशाल शहरों ने इन अस्थाई चट्टियों की जगह ले ली इन पर अब गाढ़ गदेरो व नदियों का कहर जारी है । अति निर्माण व अंधाधुंध वनों के कटान ने हमें एक टाइम बम पर बैठा दिया है ।
साथ ही ये श्रेष्ठ हिमालय जो वैष्णव और शैवों के परमाध्यक्ष व जगत नियंताओं की स्थली है । ये स्थान देवताओं के तीर्थ है न कि मानवों के, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देवर्षि नारद जी का भगवान बद्री विशाल का प्रधान अर्चक होना जो नारायण शीतकालीन पूजाऐ सम्पादित करते हैं ।
आज भी सभी देव व देवियों की डोलियां भगवान की भेंट व सिर नवाने बद्रीकाश्रम आते हैं । इसलिए भगवान और यक्ष किन्नर गन्धर्व गण, पित्र, लोकपाल ऋषि महर्षि साधक सिद्धों की भूमि पर बलात हमारे द्वारा कब्जा कर लिया गया है । यह भी इन शक्तियों के साथ संघर्ष ही है । उनके वातावरण को अस्थिर कर लिया गया है । इसलिए प्राकृतिक आपदा व अनिष्ट का होना हमारे लिए आश्चर्य जनक नहीं है । अब बद्रीकाश्रम में धर्मार्थ और मोक्षार्थी का स्थान
भोग चाहने वाले पर्यटन ने ले लिया है । हमारी नीति व व्यवहार हिमालय के साथ बदलने व समझने के साथ दोहन की न हो
ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या
जय बद्री विशाल
उमेश चन्द्र सती
बद्रीकाश्रम हिमालय
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