देहरादून। सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन ने देहरादून प्रेस क्लब में अपनी नई रिपोर्ट “उत्तराखंड ऐट अ क्लाइमेट क्रॉसरोड्स – व्हाट फोर इयर्स ऑफ डिजास्टर रिपोर्टिंग टेल अस अबाउट ग्लेशियर्स, GLOF एंड एवलांचेस” जारी की। रिपोर्ट का संयुक्त रूप से विमोचन अनूप नौटियाल और प्रवीण उप्रेती ने किया।
रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब पूरे हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और आपदा संबंधी जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान नेपाल के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए अनूप नौटियाल ने हाल की आपदा से प्रभावित लोगों और नेपाल की जनता के प्रति गहरी संवेदना जताई। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड भी एक हिमालयी राज्य होने के कारण समान रूप से संवेदनशील पर्वतीय भू-दृश्य और कई साझा चुनौतियों का सामना करता है।
रिपोर्ट संस्थान की उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव ‘उदय’ के तहत किए गए मीडिया दस्तावेजीकरण पर आधारित है। यह पहल अक्टूबर 2022 से हर महीने रिपोर्ट प्रकाशित कर रही है। नई रिपोर्ट में जून 2026 तक दर्ज घटनाक्रमों को शामिल करते हुए ग्लेशियरों के पीछे हटने, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOF), हिमस्खलन और उनसे जुड़े जोखिमों के बार-बार सामने आने वाले पैटर्न का विश्लेषण किया गया है।
फाउंडेशन ने स्पष्ट किया कि यह रिपोर्ट कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, बल्कि मीडिया-आधारित विश्लेषण है। इसमें विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों को विभिन्न संस्थानों और वैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्षों के साथ क्रॉस-रेफरेंस किया गया है। इनमें इसरो, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, ICIMOD और विभिन्न विश्वविद्यालयों के अध्ययन शामिल हैं।
रिपोर्ट में इस अवधि के दौरान सामने आए 28 अलग-अलग मीडिया अपडेट्स के विश्लेषण के आधार पर पांच प्रमुख पैटर्न और पांच प्रमुख सिफारिशों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
रिपोर्ट में सामने आया सबसे महत्वपूर्ण पैटर्न जोखिम की पहचान और समय पर कार्रवाई के बीच का अंतर है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने वर्ष 2024 में उत्तराखंड में 13 संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की थी। इनमें पांच झीलों को सबसे उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया था। इसके बावजूद निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां अभी पूरी तरह विकसित नहीं हैं।
रिपोर्ट में वसुधारा झील का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि यहां जोखिम का आकलन पूरा हो चुका था, लेकिन कई महीनों बाद भी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित नहीं किए जाने की सूचना सामने आई।
रिपोर्ट में अलकनंदा बेसिन को लेकर वर्ष 2026 के एक अध्ययन का भी उल्लेख किया गया है। अध्ययन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है। इनमें करीब 30 प्रतिशत ग्लेशियर ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र में बद्रीनाथ और माणा के आसपास स्थित बताए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे ग्लेशियरों की निगरानी भविष्य में संभावित आपदाओं के जोखिम को समझने और समय रहते चेतावनी प्रणाली विकसित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट में चार धाम स्थलों के आसपास ग्लेशियरों के लगातार पीछे हटने को भी प्रमुख चिंता के रूप में रेखांकित किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार ग्लेशियरों के पीछे हटने की वार्षिक दर लगभग:
रिपोर्ट का कहना है कि वृहत्तर हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में भी ग्लेशियर क्षेत्रफल और बर्फ के भंडार में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है। वर्ष 1990 के बाद से एक हजार से अधिक नई ग्लेशियल झीलें सामने आई हैं और मौजूदा झीलों का विस्तार हुआ है, जिससे संभावित जोखिम बढ़ा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चरम मौसम की घटनाएं लगातार अधिक अनिश्चित होती जा रही हैं। लंबे समय तक सूखे मौसम के बाद अचानक अत्यधिक वर्षा या भारी बर्फबारी जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।
दूसरी ओर, संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, पर्यटन एवं तीर्थयात्रा से जुड़ा बुनियादी ढांचा, बस्तियां और अन्य निर्माण गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के इस बदलते परिदृश्य में आपदा जोखिम को केवल अलग-अलग घटनाओं के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल जोखिम वाली जगहों की पहचान पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झील के लिए समयबद्ध कार्ययोजना, नामित नोडल एजेंसी और पर्याप्त वित्तीय संसाधन सुनिश्चित किए जाने चाहिए। निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों की तैयारी को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियरों, अस्थिर ढलानों, बढ़ती ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की व्यवस्थित पहचान एवं निगरानी की जरूरत बताई गई है।
इसके लिए सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग से प्राप्त जानकारी को मैदानी सर्वेक्षणों और स्थानीय लोगों के अवलोकनों के साथ जोड़े जाने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चार धाम की योजना में जलवायु जोखिम और क्षेत्र की वहन क्षमता को केंद्रीय स्थान दिया जाना चाहिए।
तीर्थयात्रा प्रबंधन में केवल यातायात, पानी और कचरा प्रबंधन ही नहीं, बल्कि ग्लेशियरों के पीछे हटने, चरम मौसम, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसे जोखिमों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में एक समर्पित दीर्घकालिक क्रायोस्फीयर और जलवायु-जोखिम कार्यक्रम शुरू करने की सिफारिश की गई है। इसके तहत ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी को आपस में जोड़ा जाना चाहिए।
साथ ही, प्रमुख सड़कों, सुरंगों, जलविद्युत परियोजनाओं, पर्यटन बुनियादी ढांचे और बस्तियों का बहु-आपदा जोखिम तथा पूरे भू-दृश्य पर पड़ने वाले संचयी प्रभावों के आधार पर आकलन किए जाने की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट में हिमालयी समुदायों को जलवायु अनुकूलन के केंद्र में रखने पर जोर दिया गया है। स्थानीय निवासी मौसम, जल स्रोतों, ढलानों, जंगलों और बर्फ के पैटर्न में होने वाले बदलावों के शुरुआती पर्यवेक्षक होते हैं और आपदा के समय अक्सर सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वालों में शामिल रहते हैं।
रिपोर्ट में गांव स्तर की आपदा योजनाएं, प्रशिक्षित स्वयंसेवक, सामुदायिक निगरानी प्रणालियां और बुनियादी राहत एवं प्रतिक्रिया उपकरण उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है।
अनूप नौटियाल ने कहा कि यह रिपोर्ट संबंधित सरकारी विभागों और संस्थानों के साथ भी साझा की जाएगी, ताकि वे रिपोर्ट के निष्कर्षों पर विचार कर उचित कार्रवाई कर सकें।
उन्होंने कहा कि आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और जटिलता को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये घटनाएं उत्तराखंड के तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण के संकेत हैं।
उन्होंने बेहतर तैयारी, जवाबदेही और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि बदलते हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप आपदा प्रबंधन और विकास की रणनीति को भी मजबूत करना होगा।
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